Happy women’s day

ज़िन्दगी बाँटती चली सबको, खुद घुट घुट कर अपने ही जीवन से खेली हूँ में,

इंसान हूँ , लड़का नहीं, बस यही ग़लती कि सहेली हूँ मैं,





माँ बाप ने भी जब अपना न समझा, उस मोड़ पे बेग़ाना किया,

तो क्या समझाऊँ दुनिया को, कि जिस पिता के काँधे सर रख सोया भईया,

उन्ही की गोद में ही तो खेली हूँ मैं,

इंसान हूँ, लड़का नहीं, बस यही ग़लती कि सहेली हूँ मैं,

 


 


समझ के दुनिया ने मुझे, एक खिलौना रोंध दिया,

इज़्ज़त की निग़ाह तो दूर रही, घृणा से देख मुझको दूर किया,

कैसे बतलाऊँ इस जग को के मिला वज़ूद उन्हें जहाँ से,

वही जग जननी मात अलबेली हूँ मैं,

इंसान हूँ, लड़का नहीं, बस यही ग़लती कि सहेली हूँ मैं,

 


 


अपनों पर जब भी आँच आयी, राह सच्चाई की डगमगाई,

वैरियों ने जब आक्रमण किया, अपनों को हम से छीन लिया,

तब बन कर के माँ काली, खून की होली भी खेली हूँ मैं,

इंसान हूँ, लड़का नहीं, बस यही ग़लती कि सहेली हूँ मैं,

 


 


समाज में रहने वालों, मुझे भला बुरा कहने वालों,

अंतरात्मा को माप के देखो, मन दर्पण भी झाँक के देखो,

देखो मुझपे क्या है बीती, नारी जीवन की क्या है रीति,

जन्म से लेके मृत्यु तक, बनके माँ बेटी और अर्धांगिनी,

खुशियाँ बाँटती चली, सबके ग़म उठा और मुसीबतों को भी झेली हूँ मैं,

इंसान हूँ, लड़का नहीं, बस यही ग़लती कि सहेली हूँ मैं ।



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