Soul, the immortal fire.

” रूह के मुखौटे हटा के देख ,

सब एक जैसे ही नज़र आएंगे,

गोरे चाहे काले, बुरे या दिल वाले ,

सब अंत में लौ ही बन जाएँगे ।

 

फिर कौन पूछेगा इस सूरत को,

जब सीरत नज़र आएगी,

चेहरे की रौनक नहीं

विचारों की चमक परखी जाएगी ।

 

नाम फिर से गुम जायेगा,

कर्म ही उस दिन तुम्हारे काम आएगा

खाली रखना जेबें उस वक़्त,

जो सारी उम्र भरा वो संग ना जायेगा । “

 

This is my first post where i am not going to give any description of my poetry, i would like all my readers to comment the gist of the poem, whatever you read, you understand, you feel is what i wish you all to write.

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